खरगोन: क्या आप जानते हैं कि मध्य प्रदेश में एक ऐसी जगह भी है, जहां मां लक्ष्मी और भगवान विष्णु का विवाह होने की मान्यता है? खरगोन जिला मुख्यालय से करीब 14 किलोमीटर दूर ऐतिहासिक ऊन गांव में हथिनी नदी के किनारे स्थित नारायण कुंड इस पौराणिक कथा से जुड़ा है। स्थानीय मान्यता के अनुसार, यहीं विवाह समारोह हुआ था। चट्टानों पर बने आयताकार निशानों को विवाह मंडप और पत्थरों पर उभरे निशानों को हाथियों के पैरों के चिह्न माना जाता है। करीब 1300 साल पुराने महालक्ष्मी मंदिर (Mahalakshmi Temple) के कारण भी यह गांव श्रद्धालुओं के लिए खास महत्व रखता है।
मंदिर के गर्भगृह में कमल आसन पर विराजित मां महालक्ष्मी की करीब छह फीट ऊंची स्वयंभू प्रतिमा स्थापित है। दीपावली के अवसर पर मंदिर में विशेष सजावट, पूजन और महाआरती होती है। धनतेरस और लक्ष्मी पूजन के दिन दूर-दराज के क्षेत्रों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचकर सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। यहां मानता है कि भाव के मुताबिक महालक्ष्मी तीन रूपों में दिखाई देती हैं। बाल रूप, युवा रूप और प्रौढ़ रूप।
नारायण कुंड भी अपनी पौराणिक मान्यताओं के लिए प्रसिद्धमंदिर से करीब आधा किलोमीटर दूर हथिनी नदी पर स्थित नारायण कुंड भी अपनी पौराणिक मान्यताओं के लिए प्रसिद्ध है। स्थानीय मान्यता के अनुसार इसी स्थान के समीप मां महालक्ष्मी और भगवान विष्णु का विवाह हुआ था। विवाह मंडप के लिए चट्टानों पर बनाए गए आयताकार गड्ढों के निशान आज भी मौजूद बताए जाते हैं। मान्यता है कि विवाह समारोह में मां लक्ष्मी और भगवान विष्णु हाथियों पर सवार होकर पहुंचे थे। चट्टानों पर हाथियों के पैरों के निशान होने की बात भी कही जाती है। इसी मान्यता के चलते नदी का नाम हथिनी नदी पड़ा।
मंदिर के पुजारी नरेंद्र पंडित और मंदिर से जुड़े गजेंद्र सोनी के अनुसार दीपावली के दौरान यहां विशेष धार्मिक आयोजन होते हैं। दीपावली के बाद 21 कुंडीय महायज्ञ की पूर्णाहुति होगी। इसके बाद मां महालक्ष्मी को 56 भोग अर्पित कर अन्नकूट प्रसादी वितरित की जाएगी।
99 मंदिर, तालाब और बावड़ियों से जुड़ी है ऊन की पहचानऊन को 'उल्टे श्मशान का गांव' भी कहा जाता है। इसकी वजह गांव के प्रवेश से पहले नदी किनारे स्थित श्मशान घाट है। स्थानीय पौराणिक मान्यता के अनुसार यहां एक ही रात में 99 मंदिर, 99 तालाब और 99 बावड़ियां बनाई गई थीं। मान्यता है कि यदि इनकी संख्या 100 हो जाती तो मां गंगा यहां प्रकट हो जातीं। एक संख्या कम रहने के कारण इस स्थान का नाम ऊन पड़ा, जिसे न्यून यानी कम से जोड़कर देखा जाता है।
ऊन में परमारकालीन स्थापत्य कला के अनेक उदाहरण मौजूद हैं। यहां दो महाकाल मंदिर, नीलकंठेश्वर, ओंकारेश्वर, हाटकेश्वर महादेव और बलालेश्वर सहित कई प्राचीन मंदिर हैं। बलालेश्वर मंदिर में स्थापित शिवलिंग की आकृति केदारनाथ के शिवलिंग से मिलती-जुलती बताई जाती है। यहां विशाल हिंदू चौबारा डेरा भी है, जिसका उपयोग कभी मंदिर पाठशाला के रूप में होता था। इसके पत्थर पर उत्कीर्ण अभिलेख ऐतिहासिक महत्व रखते हैं। वर्तमान में करीब 12 मंदिर जीर्ण-शीर्ण अवस्था में हैं। इन मंदिरों को खजुराहो के समकालीन माना जाता है।
जैन धर्म का भी प्रमुख तीर्थ है ऊनऊन केवल हिंदू धार्मिक आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि जैन धर्म का भी महत्वपूर्ण सिद्धक्षेत्र है। यहां स्थित प्राचीन जैन तीर्थ को पावागिरी कहा जाता है। जैन मान्यता के अनुसार यह स्वर्णभद्र सहित चार महामुनियों की निर्वाण स्थली है। यहां 12वीं शताब्दी की भगवान शांतिनाथ, कुंथुनाथ और अरहनाथ की प्रतिमाएं विराजमान हैं। खुदाई में प्राप्त 12वीं सदी की श्यामवर्ण भगवान महावीर की प्रतिमा भी मुख्य मंदिर में स्थापित है।
प्राचीन मंदिरों, बावड़ियों, तालाबों, धार्मिक मान्यताओं और ऐतिहासिक स्थापत्य के कारण ऊन पश्चिम निमाड़ का महत्वपूर्ण धार्मिक एवं ऐतिहासिक पर्यटन केंद्र बनने की क्षमता रखता है। हालांकि, स्थानीय स्तर पर इन धरोहरों के संरक्षण, प्रचार-प्रसार और पर्यटन सुविधाओं के विकास की जरूरत लंबे समय से महसूस की जा रही है।
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