सागर: दीपावली और महालक्ष्मी पूजा के पावन अवसर पर बुंदेलखंड अंचल के घरों में एक बेहद प्राचीन और अनूठी लोककला जीवंत हो उठती है। चूने की सफेद रेखाओं और ज्यामितीय आकृतियों से दीवारों और आंगनों को सजाने की यह परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है। लोकदेवी सुराती से जुड़ी यह लोककला न सिर्फ घरों की खूबसूरती बढ़ाती है, बल्कि बुंदेलखंड के लोकविश्वास और सांस्कृतिक धरोहर को भी सहेजे हुए है।
बुंदेलखंड अंचल की सांस्कृतिक विरासत में कई ऐसी लोककलाएं शामिल हैं, जो पीढ़ियों से त्योहारों और धार्मिक आयोजनों का हिस्सा बनी हुई हैं। इन्हीं में एक खास पहचान सुराती लोककला की है। दिवाली और महालक्ष्मी पूजा जैसे शुभ अवसरों पर घरों की दीवारों और आंगन में इस कला को उकेरने की परंपरा देखने को मिलती है।
चूने की सफेद रेखाओं से सजते हैं घर और आंगनसुराती बनाने के लिए बुझा हुआ चूना इस्तेमाल किया जाता है। इससे घरों की दीवारों और फर्श पर अलग-अलग तरह की ज्यामितीय आकृतियां बनाई जाती हैं। त्रिकोण, खड़ी और आड़ी रेखाओं का संयोजन इस कला को विशेष रूप देता है। साधारण सामग्री से तैयार होने वाली ये आकृतियां बुंदेलखंड की पारंपरिक कला-कौशल और रचनात्मकता को दर्शाती हैं।
लोकदेवी सुराती से जुड़ी है धार्मिक मान्यताइस लोककला का संबंध लोकदेवी सुराती से माना जाता है। पारंपरिक मान्यताओं में इन आकृतियों को प्रकृति के तत्वों और शुभता के प्रतीकों के रूप में देखा जाता है। त्योहारों के दौरान इन्हें बनाने का उद्देश्य घरों को सजाने के साथ धार्मिक आस्था और पारिवारिक परंपरा को जीवित रखना भी है।
पीढ़ियों से चली आ रही है बुंदेलखंड की पहचानसुराती लोककला बुंदेलखंड की उन सांस्कृतिक परंपराओं में शामिल है, जिनमें स्थानीय जीवन, लोकविश्वास और कलात्मक अभिव्यक्ति एक साथ दिखाई देते हैं। आधुनिक सजावट के दौर में भी त्योहारों पर इस तरह की पारंपरिक कलाओं का महत्व बना हुआ है। ऐसी लोककलाएं मध्य प्रदेश की सांस्कृतिक विविधता को देश-दुनिया के सामने पहचान दिलाती हैं।
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