नए हस्तरेखाविदों के सामने सबसे बड़ी कठिनाई जातक के हाथ में उचित पर्वत को निर्धारित करने में आती है। हस्तरेखा का परीक्षण करते समय अक्सर पर्वतों के अस्पष्ट होने की दशा में यह समस्या बढ़ जाती है। प्रत्येक उंगली सम्बद्धित पर्वत के नाम से जानी जाती है और उसके गुणों को ही ग्रहण करती है। भौतिक दृष्टि में यह पर्वत मांसपिण्ड या मांसल गद्दियां मात्र हैं, जो हाथ में अंगुलियों की जड़ पर या अन्य स्थलों पर बाहर को उभरे हुए दिखाई देते हैं।
कुछ हाथों में यह छोटी-छोटी पहाड़ियों जैसे दिखाई देते हैं, कुछ में यह पूरी तरह सपाट होते हैं तथा कुछ हाथ ऐसे भी होते हैं, जिनमें पर्वत स्थानों पर गड़े होते हैं या ऐसे स्थल धंसे हुए होते हैं। स्पष्ट एवं उभरे हुए पर्वत उन्नत एवं सशक्त माने जाते हैं, समतल एवं सपाट पर्वत साधारण होते हैं और धंसे हुए स्थल दुर्बलता और पर्वत के गुणों का अभाव दर्शाते हैं। ज्योतिर्विद द्वारा हाथ के पर्वत यानि उससे संबंधित ग्रह का तारतम्य जन्मकुण्डली में बैठे ग्रहों से जब स्थापित हो जाता है, तब ग्रहीय फलादेश पूर्ण रूप से सटीक होता है।
पर्वतों की परख करने में सबसे पहले यह पता लगाना चाहिए कि सर्वाधिक सशक्त पर्वत कौन-से ग्रह का है। पर्वत विशेष की प्रबलता उस जातक में उसके गुणों की प्रमुखता को दर्शाती है। यदि एक पर्वत का आकार बहुत बड़ा हो और अन्य का सामान्य, तो यह इस बात का पक्का संकेत होगा कि व्यक्ति उस सशक्त पर्वत से सम्बन्धित ग्रह के गुण आदि से सम्बन्ध रखता है।
यदि इसके अतिरिक्त इस पर्वत की अंगुली भी अन्य अंगुलियों से अधिक लम्बी और सुविकसित हो, तब तो इस बात में कोई सन्देह ही नहीं रह जाता कि जातक वास्तव में इस पर्वत का शुद्ध प्रतिरूप है। विकसित, अर्थात् उन्नत पर्वत सबसे अधिक प्रभावी माने जाते हैं। यदि किसी पर्वत पर एक ऐसी स्पष्ट रेखा हो, जो गहरी होने के साथ-साथ तिरछी रेखाओं से कटी हुई नहीं हो, तो यह समझ लेना चाहिए कि वह रेखा सपाट पर्वत होने की कमी को दूर करके उसे विकसित पर्वत जितनी विशिष्टता प्रदान करती है। किसी पर्वत पर आड़ी-तिरछी रेखाओं का जाल उस पर्वत को विकारग्रस्त एवं दोषी बना देता है। हाथ में स्थित पर्वतों एवं हस्तरेखा की भाषा समझना समय और अनुभव के साथ ही बढ़ती रहती है।
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