सीतामढ़ी: मिथिला में विवाह के अवसर पर भगवान श्रीराम को 'गारी' (गाली) देने की परंपरा कोई नई नहीं, बल्कि सदियों पुरानी है। ये मिथिला की लोक-सांस्कृतिक विरासत मानी जाती है। इसके पीछे अनादर का भाव नहीं, बल्कि प्रेम, अपनापन और पारिवारिक अधिकार की भावना है। मिथिलावासी माता सीता को अपनी बेटी और भगवान राम को अपना पाहुन अर्थात दामाद मानते हैं। इसी रिश्ते के भाव में विवाह के अवसर पर महिलाएं वर पक्ष के साथ हास्य-विनोद से भरे गारी गीत गाती हैं।
इस परंपरा का उल्लेख गोस्वामी तुलसीदास रचित श्रीरामचरितमानस के बालकांड में भी मिलता है। राम-सीता विवाह के बाद 'जेवनार' अर्थात भोजन के प्रसंग में मिथिला की महिलाओं द्वारा गारी गाने का वर्णन है। चौपाई में कहा गया है 'जेवंत देहिं मधुर धुनि गारी, लै-लै नामु संकरहिं नारी। अर्थात भोजन के समय महिलाएं मधुर स्वर में गारी गाती हुई भगवान शिव तक का नाम लेकर हास-परिहास करती हैं। इससे विवाह समारोह का वातावरण आनंदमय हो उठता है।
'गारी' से अपनेपन का अहसासमिथिला की इस परंपरा में गारी को बेटी के विवाह के अवसर पर मायके पक्ष की सहज अभिव्यक्ति माना जाता है। महिलाएं अपने पाहुन से हंसी-मजाक कर अपनेपन का एहसास कराती हैं। लोकमान्यता है कि भगवान राम ने भी मिथिला की महिलाओं के इस हास्य-विनोद को सहजता से स्वीकार किया था। यही कारण है कि आज भी मिथिला और आसपास के क्षेत्रों में विवाह के अवसर पर 'गारी गीत' गाने की परंपरा जीवित है। ये परंपरा बताती है कि मिथिला की संस्कृति में ईश्वर को भी प्रेम और पारिवारिक आत्मीयता के रिश्ते में बांधने का अनूठा भाव विद्यमान है।
मिथिला की बेटी से श्रीराम की शादीसीतामढ़ी के वरीय पत्रकार सह धार्मिक आलेखों में अपनी एक अलग पहचान रखने वाले बाल्मीकि कुमार कहते है, 'विदेह राज जनक की पुत्री सीता का विवाह स्वयंवर के पश्चात् अयोध्या के धर्मचक्रवर्ती महाराज दशरथ के पुत्र श्रीराम से हुई। मिथिला इस नाते भगवान श्रीराम का ससुराल हैं। मिथिलांचल की परंपरा के अनुसार ससुराल मिथिला में भगवान श्रीराम को मर्यादापूर्वक लोग गारी (गाली) भी देते हैं, जिसमें श्रद्धा के साथ स्नेह का भाव परिपूर्ण होता हैं।'
उन्होंने कहा, 'परंपरागत गीतों में भी सिया जी बहिनिया हमार हे, रामजी लगीहे पाहुनमा और रामजी से पूछे जनकपुर की नारी, बता द बबुआ-लोगवा देता काहे गारी.. बता द बबुआ।' जैसे अनगिनत गीत भावपूर्वक गाकर स्नेह, प्रेम और श्रद्धा से लोग भावविह्वल होते हैं। रिश्ते की अटूट परंपरा को बनाए रखने के लिए ही प्रतिवर्ष अगहन माह में विवाह पंचमी के अवसर पर मिथिला में भव्य श्रीराम-सीता विवाहोत्सव का आयोजन श्रद्धा और उत्साह के साथ किया जाता हैं।
दामाद प्रभु श्रीराम को गाली पुरानी परंपरा'सीता संवाद' के निदेशक आग्नेय कुमार कहते है कि मिथिला के नाता से सीता जी बहिन है, क्योंकि वह धरती पुत्री है। राजा जनक मिथिला के राजा थे, इसलिए जनक नंदिनी प्रजा के लिए बहन हैं। प्रभु श्रीराम मिथिला के पावन धरा पर भक्ति भूमि पर बहनोई हैं, पाहुन हैं। हंसी-मजाक, ठिठोली, हास्य-प्रमोद पाहुन संग विवाहोत्सव में खूब देखा जाता है। गाली वाली रीति रिवाज, परम्परा, संस्कृति मिथिला की मधुरता है। मिथिला की सखियां मर्यादित सवाल करती हैं और बहनोई राम उसका जवाब देते हैं।
मिथिला की रीति-रिवाज परंपरा और संस्कृति में शादी में हंसी-मजाक और दुल्हा को गाली देने का प्रचलन सदियों पुराना है। बारातियों को भोजन कराते समय समधि को भी गाली सुनना पड़ता है और बारातियों का भी स्वागत गाली देकर ही होता है। यह गाली व्यक्तिगत नहीं होता है। इसमें कुल-वंश-परंपरा की बातें होती है। प्रभु श्री राम के रंग रूप और स्वभाव का वर्णन होता है। इसलिए मिथिला की पावन भूमि पर सीताराम विवाह उत्सव में गाली मिथिला का श्रृंगार है। ये प्रभु को रिझाने का ही एक माध्यम है, जिससे प्रभु मंद-मंद मुस्काते हैं और मिथिला की गाली का आनंद लेते हैं।
श्रीराम को 'गारी' मैथिल परंपरा का हिस्साआजकल, । श्रीकृष्ण को लेकर टिप्पणी करने के बाद धीरेंद्र शास्त्री को आलोचनाओं का सामना करना पड़ा। यहां तक कि उन्हें बाद में माफी तक मांगनी पड़ी। लेकिन, मिथिला की महिलाओं को भगवान श्रीराम को गारी (गाली) देने का अधिकार सदियों से हासिल हैं।
जैसे- 'तोहरी सुरतिया पे काहे लुभालीं, गोरी सीता सुकुमारी', 'एक भाई गोर एक काहे कारी...बता दो बबुआ लोगवा देत काहे गारी'। ये गालियां, उलाहने और ताने ब्याहने आए किसी दूल्हे को नहीं बल्कि को मिलती है। बिहार की धरती पर श्रीराम को सदियों से गालियां और ताने सुनने पड़ रहे हैं। मिथिला की मीठी-मीठी परंपरा का हिस्सा है, जिसमें श्रीराम उनके लिए भगवान नहीं बल्कि पाहुन (दामाद) हैं।
बेटी सीता को ब्याहने आए श्रीराम को मिथिला की नारियों ने जो उलाहने दिए, वे आज तक यहां के लोकगीतों में जिंदा हैं। दरअसल, मिथिला में भगवान राम सिर्फ एक आराध्य नहीं हैं, वो मिथिला के दामाद भी हैं। दामाद के इस आत्मीय रिश्ते के कारण ही मिथिला की महिलाएं पूरे अधिकार से श्रीराम के साथ हास्य-व्यंग्य और मीठा उलाहना देती हैं।
रंग-रूप पर प्रभु श्रीराम को मीठा उलाहनाजनकपुर की महिलाएं माता सीता के अति-सुंदर और गौर वर्ण के सामने श्रीराम के सांवले रंग पर चुटकी लेते हुए उलाहना देती हैं।
- राम जी से पूछे जनकपुर के नारी, बता द बबुआ...
- तोहरी सुरतिया पे काहे लुभालीं, गोरी सीता सुकुमारी...
श्रीराम के चरण-स्पर्श से पत्थर बनी अहिल्या का उद्धार हुआ था। जब श्रीराम जनकपुर आते हैं, तो मिथिला की महिलाएं डरने का नाटक करते हुए उलाहना देती हैं।
- अपने चरण के धूलि बचा के रखिहऽ पाहुन
- कतहु जे तोर पग पड़त सिल पर ओहो नारी बन जात हे
विवाह के भोजन (समधौन/जेवनार) के समय मिथिला में दूल्हे (श्रीराम), उनके भाइयों (लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न) और बारात (राजा दशरथ और गुरु वशिष्ठ) को उलाहना भरे गीत सुनाए जाते हैं।
- केहन समधी अओला हे..कतहु न देखलीं एहन अवध के राजा
- भूखे-प्यासे चलि आएला..हमरा जानकी के रूप पर लुभाएला
सीता जी की विदाई के समय मिथिला की महिलाएं श्रीराम को उलाहना देती हैं कि वे उनकी अत्यंत लाडली सुकुमारी सीता को अयोध्या की कठिन राहों में ले जा रहे हैं।
- हमरा जनकपुर के सुकुमारी सीता... तोरा संग चलली अवध नगरिया
- जौं कतहु दुःख देबै हे पाहुन...त मिथिला के लोग नहि बख्शतौ
ये उलाहना किसी अपमान का प्रतीक नहीं है, बल्कि 'माधुर्य भाव' की भक्ति का चरम रूप है। मिथिलावासी श्रीराम को भगवान मानकर दूर से हाथ जोड़ने के बजाय उन्हें अपने परिवार का हिस्सा मानकर प्रेम से चिढ़ाते और दुलारते हैं।
इनपुट- अमरेंद्र चौहान