पटनाः पर उपदेस कुसल बहुतेरे, जे आचरहिं ते नर न घनेरे। रामचरित मानस की इस चौपाई का अर्थ है, दूसरों को उपदेश देने में लोग बहुत कुशल होते हैं लेकिन ऐसे लोग बहुत कम मिलते हैं जो स्वयं इन उपदेशों के अनुसार आचरण करते हैं। जदयू के नेता भाजपा पर गठबंधन धर्म का पालन नहीं करने का आरोप लगा रहे हैं। MLC चुनाव में निर्दलीय जीत हासिल करने वाले राहुल राज और बंशीधर ब्रजवासी के भाजपा के प्रति समर्थन दिखाने पर जदयू ने एतराज जताया है। चूंकि इन दोनों ने जदयू प्रत्याशी को हरा कर जीत हासिल की है इसलिए जदयू को ये बात नागवार गुजर रही है। क्या जदयू ने कभी गठबंधन धर्म का उल्लंघन नहीं किया है? इस सवाल पर राजनीतिक समीक्षक विजय नारायण ने रामायण की उपर्युक्त चौपाई से अपनी बात शुरू की।
संजय झा को भाजपा ने 2006 में बनाया था MLCविजय नारायण ने कहा, भाजपा के एक नेता जदयू में लाए गये और वे अभी दल के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष हैं। अगर घटनाक्रम को विस्तार से जानेंगे तो अनुमान लगाना आसान हो जाएगा कि आज आरोप लगाने वाले जदयू ने गुजरे वक्त में किस हद तक गठबंधन धर्म निभाया है। उन्होंने कहा, पहले भाजपा में थे। दिल्ली में सक्रिय थे और उन्हें वरिष्ठ नेता अरुण जेटली का संरक्षण प्राप्त था। 2006 में भाजपा ने उन्हें बिहार विधान परिषद का सदस्य बनाया था।
भाजपा नेता संजय झा जब जदयू में गये तो सवाल उठा थाराजनीतिक समीक्षक के मुताबिक, संजय झा मई 2012 तक भाजपा के MLC रहे। चूंकि भाजपा नेता अरुण जेटली के बहुत करीबी थे, इसलिए उनकी संजय झा से भी जान पहचान बढ़ गयी। फिर दोनों के संबंध प्रगाढ़ हो गये। 2012 में नीतीश कुमार ने भाजपा नेता संजय झा को अपनी पार्टी (जदयू) में शामिल कर लिया। संजय झा के जदयू में जाने पर भाजपा ने नीतीश कुमार पर गठबंधन धर्म को तोड़ने का आरोप लगाया था।
उस समय भाजपा और जदयू में थी बहुत कड़वाहटजिस समय संजय झा को नीतीश कुमार ने अपने दल में शामिल कराया था उस समय जदयू और भाजपा के रिश्ते में जबर्दस्त कड़वाहट घुल चुकी थी। दोनों एक साथ सरकार में थे लेकिन हद से ज्यादा कटुता बढ़ गयी थी। इसकी वजह थी गुजरात के मुख्यमंत्री का भाजपा में दबदबा बढ़ना। नीतीश कुमार ने जब राष्ट्रपति चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी प्रणब मुखर्जी का समर्थन कर दिया तो भाजपा ने उन पर गठबंधन धर्म तोड़ने का आरोप लगाया था।
एक अखबार ने क्या लिखा था इस राजनीतिक पाला बदल पर?एक अंग्रेजी अखबार के मुताबिक, अप्रैल 2012 में दिल्ली में बिहार दिवस का आयोजन किया गया था। इस आयोजन में संजय झा का योगदान था। समारोह में तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश शामिल हुए थे। लेकिन इस कार्यक्रम में किसी भाजपा नेता को नहीं बुलाया गया था। भाजपा ने जब संजय झा के जदयू में जाने पर नीतीश कुमार की आलोचना की तो संजय झा ने सफाई दी थी, मैंने भाजपा के बड़े नेताओं को अपने फैसले के बारे में बता दिया और उनकी सहमति भी ले ली थी।
संजय झा को पार्टी में लेने पर जदयू को फिर सोचना चाहिएउस समय (जुलाई 2012) भाजपा के मीडिया प्रभारी राकेश कुमार सिंह ने कहा था, संजय झा ने एक पार्टी से इस्तीफा दे कर उसी अलायंस की दूसरी पार्टी में शामिल हो कर, अलायंस का मजाक उड़ाया है। यह बहुत बुरा है। जदयू को, संजय झा को अपनाने के अपने फैसले पर फिर से सोचना चाहिए। भाजपा का यह बयान ऑन रिकॉर्ड है। इसके अलावा भाजपा नेता विनोद नारायण झा और विजय मिश्र ने कहा था, एनडीए में ऐसी घटना पहले कभी नहीं हुई। दो साल बाद यानी 2014 में संजय झा ने दरभंगा से जदयू के टिकट पर भाजपा के विरोध में लोकसभा का चुनाव लड़ा। लेकिन हार गये।
2012 में किसने तोड़ा था गठबंधन धर्म, क्या कहा था भाजपा ने?विजय नारायण ने सवाल पूछा, अब बताए कि जदयू ने गठबंधन धर्म तोड़ा या भाजपा ने? इसकी शुरुआत किसने की? आज जदयू के लोग गठबंधन धर्म पर भाजपा को जो उपदेश दे रहे हैं, क्या उन्होंने 2012 में खुद इसका पालन किया? ऐसा लग रहा है कि MLC चुनाव, जदयू पर भारी पड़ रहा है। विधायक अनंत सिंह को पार्टी से निकालने के बाद अब भाजपा के भीतरघात को लेकर जदयू में माहौल गरमाया हुआ है। अगर भाजपा के नेता चुनाव में जदयू का सहयोग नहीं कर रहे थे तो उसी समय यह मुद्दा क्यों नहीं उठाया गया? अगर ऐसा होता तो समय रहते समाधान भी निकल गया होता। लेकिन अब ऐसे आरोपों से गठबंधन में अविश्वास ही बढ़ेगा।
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