नई दिल्ली: कांग्रेस सांसद और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने IDBI बैंक के निजीकरण को लेकर केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार पर निशाना साधा है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार ने पहले बैंक को खरीदने के लिए बोली लगवाई और उसके बाद उसकी कीमत तय की। राहुल गांधी ने कहा कि कांग्रेस के शासनकाल में देश के औद्योगिक विकास के लिए बैंक बनाए जाते थे, जबकि मोदी सरकार के कार्यकाल में सरकारी बैंकों को बेचा जा रहा है। उन्होंने IDBI बैंक के कर्मचारियों के साथ खड़े रहने का भरोसा दिया है।
राहुल गांधी ने शुक्रवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट कर लिखा, 'कांग्रेस के समय में IDBI बना, देश का उद्योग खड़ा करने के लिए। मोदी के समय में पहले बोली देखी गई, फिर दाम तय हुआ। कांग्रेस के टाइम पे बैंक बनते थे। मोदी के टाइम में बिकते हैं। मैं IDBI बैंक के कर्मचारियों के साथ खड़ा हूं।'
IDBI कर्मचारियों के नाम राहुल गांधी ने लिखा लेटरराहुल गांधी ने IDBI बैंक के कर्मचारियों को संबोधित करते हुए एक लेटर लिखा है। लेटर में राहुल गांधी ने बताया कि पिछले साल मार्च में बैंक के कर्मचारियों का एक प्रतिनिधिमंडल संसद भवन में उनसे मिला था। कर्मचारियों ने सवाल उठाया था कि जिस बैंक को उन्होंने मुनाफे में पहुंचाया, उसे सरकार क्यों बेच रही है?

राहुल गांधी के मुताबिक, 'उन्होंने लोकसभा में यह मुद्दा उठाते हुए सरकार से पूछा था कि एक मुनाफे वाले सरकारी बैंक को बेचने की जरूरत क्यों है और इसके कर्मचारियों तथा जमाकर्ताओं के हितों की सुरक्षा कैसे की जाएगी। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार इस सवाल का संतोषजनक जवाब नहीं दे पाई। अब बैंक को कनाडा की कंपनी Fairfax को बेचने का फैसला किया गया है।'
'7 साल में घाटे से 9 हजार करोड़ के मुनाफे तक पहुंचा बैंक'राहुल गांधी ने लेटर में IDBI बैंक के प्रदर्शन का जिक्र करते हुए कहा कि इसकी शुरुआत एक विकास बैंक के रूप में हुई थी। बाद में इसे वाणिज्यिक बैंक में बदलने का सफर आसान नहीं रहा, लेकिन कर्मचारियों ने चुनौतियों का सामना किया। उन्होंने दावा किया कि करीब सात साल पहले IDBI बैंक घाटे में चल रहा था, जबकि पिछले साल बैंक ने 9 हजार करोड़ रुपये से अधिक का मुनाफा कमाया। राहुल गांधी ने इस बदलाव का श्रेय बैंक के कर्मचारियों को देते हुए कहा कि यह उनकी मेहनत का नतीजा है।
सरकारी हिस्सेदारी घटाए जाने पर जताई आपत्तिकांग्रेस सांसद ने बैंक के स्वामित्व में होने वाले बदलाव पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि फिलहाल सरकार और एलआईसी के पास IDBI बैंक की करीब 95 फीसदी हिस्सेदारी है। निजीकरण के बाद यह हिस्सेदारी घटकर करीब 34 फीसदी रह जाएगी।
राहुल गांधी ने 2003 में संसद में किए गए उस वादे का भी जिक्र किया, जिसमें सरकार ने IDBI में कम से कम 51 फीसदी हिस्सेदारी बनाए रखने की बात कही थी। उन्होंने कहा कि भले ही यह वादा कानून में दर्ज न हो, लेकिन संसद में किया गया वादा देश की जनता से किया गया वादा होता है। उन्होंने आशंका जताई कि बैंक के निजी हाथों में जाने के बाद SC, ST और OBC वर्गों के लिए आरक्षण की व्यवस्था खत्म हो सकती है।
उन्होंने IDBI बैंक के कर्मचारियों को भरोसा दिलाया कि वह उनके संघर्ष में उनके साथ हैं और उनकी सभी जायज मांगों का पूरा समर्थन करते हैं।
क्यों चर्चा में है IDBI बैंक?IDBI बैंक के निजीकरण का मामला दरअसल सरकारी हिस्सेदारी बेचकर बैंक का नियंत्रण एक निजी विदेशी कंपनी को सौंपने से जुड़ा है। केंद्र सरकार ने कनाडा की कंपनी Fairfax को IDBI बैंक की 60.72% हिस्सेदारी बेचने की मंजूरी दे दी है। यह सौदा करीब 52,878 करोड़ रुपये में हुआ है।
कब हुई थी IDBI बैंक की शुरुआत?
- IDBI बैंक की स्थापना 1964 में देश की औद्योगिक विकास की रफ्तार के बढ़ावा देने के लिए की गई थी। इस बैंक का मकसद कंपनियों और बड़े प्रोजेक्ट्स को कर्ज उपलब्ध कराना था।
- 1964 में जब इस बैंक की शुरूआत हुई थी, जब यह RBI के पूर्व स्वामित्व वाली संस्था थी।
- वर्ष 1976 में इसका स्वामित्व केंद्र सरकार को सौंपा गया।
बैंक कर्मचारी क्यों कर रहे हैं विरोध?
- आरक्षण का मुद्दा: सरकारी बैंक में SC, ST और OBC वर्गों के लिए लागू आरक्षण व्यवस्था निजी बैंक बनने के बाद जारी रहेगी या नहीं, यह बड़ा सवाल है। इस मुद्दे को लेकर कर्मचारी मुखर हैं।
- नौकरी की सुरक्षा: निजी प्रबंधन आने के बाद सेवा शर्तों, प्रमोशन और नौकरी की सुरक्षा पर असर पड़ने की आशंका है।
- सार्वजनिक नियंत्रण: कर्मचारियों का मानना है कि जनता के पैसे से बने बैंक पर सार्वजनिक क्षेत्र का नियंत्रण बने रहना चाहिए।