रांची: झारखंड की हेमंत सरकार बजट के पैसे खर्च करने में फिसड्डी साबित हो रही है। चालू वित्तीय वर्ष 2026-27 के करीब सात महीने बीत जाने के बाद भी योजना बजट की राशि खर्च करने में विभागों का सुस्त रवैया सामने आया है। राज्य में पुनरीक्षित योजना बजट (Revised Plan Budget) का महज एक-तिहाई हिस्सा ही विकास कार्यों पर लग सका है। वित्त विभाग के तय मानकों के अनुसार अब तक लगभग 50% राशि खर्च हो जानी चाहिए थी, लेकिन वास्तविक खर्च लक्ष्य से काफी पीछे है। बजट की धीमी प्रगति पर चिंता जताते हुए वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर ने प्रशासनिक महकमे को निर्देश जारी किए हैं ताकि विकास योजनाओं में तेजी लाई जा सके और तय समय सीमा में वित्तीय लक्ष्यों को हासिल किया जा सके।






7 महीने में सिर्फ 31 हजार 196 करोड़ खर्चचालू वित्तीय वर्ष में 22 अक्तूबर 2026 तक 1,06,200.94 करोड़ रुपए के पुनरीक्षित योजना बजट के महज 31,196.72 करोड़ रुपए (29.38%) ही खर्च हो सके हैं। वित्त विभाग के 10 जून 2015 के निर्देशों के मुताबिक, 1 अप्रैल से 30 सितंबर के बीच 50% राशि खर्च करने का प्रावधान है। इस प्रकार राज्य अपने निर्धारित लक्ष्य से करीब 21 प्रतिशत पीछे चल रहा है।






वित्त मंत्री ने विकास आयुक्त को लिखा पत्रयोजना मद में धीमी प्रगति को देखते हुए वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर ने विकास आयुक्त अजय कुमार सिंह को पत्र लिखा है। उन्होंने अधिकारियों को कई अहम निर्देश भी दिए हैं।





  • समीक्षा बैठक: कम खर्च वाले संबंधित विभागों के सचिवों के साथ तत्काल बैठक कर कारणों की समीक्षा की जाए।

  • दिसंबर का लक्ष्य: दिसंबर 2026 तक योजना बजट का कुल खर्च करीब 75 हजार करोड़ रुपए तक पहुंचाना सुनिश्चित किया जाए।

  • वित्तीय अनुशासन: मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की सरकार के वित्तीय प्रबंधन और अनुशासन के प्रति संकल्प को प्राथमिकता दी जाए।

  • प्रभावी कदम: सभी विभाग योजनाओं के क्रियान्वयन और फंड के उपयोग में तेजी लाने के लिए तुरंत कड़े उपाय करें।




टेंडर प्रॉसेस में में देरी खर्च में बड़ी बाधावित्त मंत्री के अनुसार निर्माण और पथ निर्माण जैसे प्रमुख विभागों में निविदा (टेंडर) निपटारे की प्रक्रिया काफी जटिल और धीमी है। टेंडर प्रक्रिया पूरी होने में छह महीने से लेकर डेढ़ साल तक का समय लग जाता है। इस प्रशासनिक विलंब के कारण योजनाओं का जमीनी क्रियान्वयन समय पर शुरू नहीं हो पाता, जिससे बजट राशि का समय पर उपयोग नहीं हो पाता है।




पेयजल स्वच्छता विभाग सबसे पीछे


  • पेयजल स्वच्छता विभाग ने 4.88 फीसदी खर्च किया।

  • गृह, कारा और आपदा प्रबंधन विभाग का खर्च 6.20 प्रतिशत।

  • ग्रामीण विकास विभाग का खर्च 11.59 प्रतिशत ही हो पाया।

  • वन, पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन विभाग ने 12.68 प्रतिशत खर्च की।

  • एसटी, एसटी, अल्पसंख्यक और पिछड़ा वर्ग कल्याण विभाग ने 15.69 प्रतिशत।

  • शहरी विकास विभाग ने 15.94 प्रतिशत राशि खर्च की है।

  • पथ निर्माण विभाग ने 19.79 प्रतिशत खर्च किए हैं।

  • कृषि और संबद्ध गतिविधियों पर 21.40 प्रतिशत राशि खर्च किए गए।

  • स्वास्थ्य विभाग में कुल बजट का 24.81 प्रतिशत राशि खर्च किया।

  • उच्च और तकनीकी शिक्षा विभाग में 26.17 प्रतिशत खर्च हुई है।

  • खाद्य, सार्वजनिक वितरण और उपभोक्ता विभाग का खर्च 16.54 प्रतिशत।




टेंडर को 60 दिनों में निपटाने की हिदायतकम खर्च को राज्य सरकार के लिए घोर चिंता का विषय बताते हुए वित्त मंत्री ने सुधार के उपाय सुझाए हैं। उन्होंने विभागों को हर हाल में 60 दिनों के भीतर टेंडर प्रक्रिया पूरी करने का निर्देश देने की बात कही है। वर्ष 2025-26 में भी कुल योजना बजट का केवल 76% हिस्सा ही खर्च हो पाया था, इसलिए इस बार दिसंबर तक खर्च में सुधार लाने के कड़े प्रयास किए जा रहे हैं।

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