नई दिल्ली: भारतीय रेल ने ट्रेन चलाई है तो उसके टॉयलेट में पानी की व्यवस्था करना उसी की जिम्मेदारी है। यह कहते हुए कर्नाटक के Shivamogga District Consumer Disputes Redressal Commission दक्षिण पश्चिम रेलवे को 16,000 रुपये का हर्जाना भरने का आदेश दिया है। कंज्यूमर कोर्ट ने इस मामले में रेलवे की सेवा में कमी पाई और याची को रेलवे से राहत दिलवायी।
क्या है मामला
हमारे सहयोगी टाइम्स ऑफ इंडिया में आई एक रिपोर्ट के अनुसार यह मामला कर्नाटक का है। वहां शिवमोगा में बसावनगुडी इलाके के पीडब्ल्यूडी क्वार्टर में रहने वाले नागेंद्र अपने परिवार के 24 सदस्यों के साथ को गए थे। वहां से वापसी के क्रम में वह 15 अप्रैल 2025 को यशवंतपुर से शिवमोगा तक की यात्रा ट्रेन संख्या 66575 से कर रहे थे। इस ट्रेन में यात्रा के लिए उन्होंने ग्रुप के 20 वयस्कों और 4 बच्चों के लिए 1,000 रुपये टिकट कटाने में खर्च किया था। यात्रा शुरू हुई तो पता चला कि डिब्बे के टॉयलेट या वाशरूम में तो पानी ही नहीं है। इसकी जानकारी उन्होंने ट्रेन में चल रहे पुलिस पर्सनल को दी। लेकिन समाधान नहीं हुआ।
फिर क्या हुआ?
पुलिस पर्सनल ने यात्री को सलाह दी कि आपलोग ट्रेन से उतर कर दर्ज कराओ। इसके बाद वह परिवार के साथ एक रेलवे स्टेशन पर उतर गए और स्टेशन मास्टर के पास जा कर कंप्लेन दर्ज करायी। इस चक्कर में उनकी ट्रेन निकल गई और उन्हें दूसरे ट्रेन में यात्रा करनी पड़ी। उस ट्रेन में यात्रा करने के लिए उन्हें फिर से 1,760 रुपये का टिकट खरीदना पड़ा।
कोर्ट का दरवाजा खटखटाया
यात्रा पूरी होने के बाद नागेंद्र ने शिवमोगा के उपभोक्ता फोरम या का दरवाजा खटखटाया। फोरम के अध्यक्ष टी. शिवन्ना और सदस्य बी.डी. योगनंद की पीठ ने इस मामले की सुनवाई की। मामले पर बहस के दौरान दक्षिण पश्चिम रेलवे ने कहा कि यह दावा आधारहीन है। रेलवे के मुताबिक जिस तारीख की बात हो रही है, उस दिन इस तरह की कोई शिकायत ही दर्ज नहीं हुई है। यही नहीं, जिस दिन की बात हो रही है, उस दिन ट्रेन के शुरुआती स्टेशन पर ही शौचालय में पानी भरा गया था।
कोर्ट ने क्या फैसला सुनाया?
कंज्यूमर कोर्ट ने साउथ वेस्टर्न रेलवे की दलील को खारिज करते हुए उसे जिम्मेदार माना। कोर्ट का कहना था कि यह तो सेवा में कमी का मामला है। इसलिए याची को टिकट का दाम मतलब कि 1,000 रुपये तो वापस किया ही जाए। साथ ही इस पर यात्रा की तारीख मतलब कि 15 अप्रैल 2025 से छह फीसदी ब्याज भी दिया जाए। यदि 45 दिनों के अंदर यह भुगतान नहीं होता है तो ब्याज की दर बढ़ कर 10 फीसदी सालाना हो जाएगी। इसके साथ ही रेलवे को 10,000 रुपये का हर्जाना और मुकदमा का खर्च के लिए भी 5,000 रुपये भरने का आदेश दिया।
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