पटना: पटना उच्च न्यायालय ने प्रवर्तन निदेशालय (ED) और बिहार की विशेष सतर्कता इकाई (SVU) से सवाल किया है कि उन्होंने करोड़ों रुपये के निविदा घोटाले से जुड़े कई वरिष्ठ अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं की। अदालत ने टिप्पणी की कि ऐसा लगता है कि संबंधित अधिकारी “कुछ लोगों को बचाने और कुछ को फंसाने” की कोशिश कर रहे हैं। न्यायमूर्ति सत्यव्रत वर्मा की एकल पीठ ने 15 अक्टूबर को पारित एक आदेश में कहा कि हिरासत में मौजूद याचिकाकर्ता, कथित धनशोधन मामले का मुख्य सरगना होने के बजाय, एक मोहरा मात्र लगता है, जबकि असली सूत्रधार पर्दे के पीछे हैं।




पटना हाई कोर्ट की टिप्पणीपीठ ने यह आदेश उस मामले की सुनवाई के दौरान पारित किया, जिसमें जोन प्रतिवादी है। इस साल जून में, एसवीयू ने करोड़ों रुपये के निविदा घोटाले की अपनी जांच के तहत, एक आईएएस अधिकारी समेत सात लोगों के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किया। ​​सरकारी निविदाओं में भ्रष्टाचार के आरोपों के बाद, ईडी ने इस मामले की जांच की। जांच के दौरान कई अभियंताओं और अधिकारियों के नाम सामने आए। ईडी की जांच से मिली जानकारी और सबूतों के आधार पर, एसवीयू ने अलग-अलग प्राथमिकी दर्ज करके जांच शुरू की।




ईडी से पूछा सख्त सवालअधिकारियों ने बताया कि रिशु श्री की कंपनी बिहार सरकार के विभिन्न विभागों - जैसे जल संसाधन, स्वास्थ्य, लोक स्वास्थ्य अभियांत्रिकी, शहरी विकास, शिक्षा, भवन निर्माण और ग्रामीण कार्य - के लिए ठेकेदार और उप-ठेकेदार के रूप में काम करती हैं। उन पर आरोप है कि उन्होंने निजी लाभ के लिए निविदा हासिल करने के वास्ते सरकारी अधिकारियों के साथ सांठगांठ कर रखी थी। एसवीयू ने इस साल 27 मई को निविदा में हेराफेरी और धनशोधन के एक कथित मामले में ठेकेदार रिशु श्री को गिरफ्तार किया था। वह अभी न्यायिक हिरासत में है।




अधिकारियों को बचाने की कोशिश- कोर्टअधिकारियों ने बताया कि ईडी की छली रिपोर्ट में आरोप लगाया गया था कि में दो आईएएस अधिकारियों और उनके परिवार के सदस्यों की विदेश यात्राओं तथा अन्य खर्च के लिए पैसे दिए थे। मामले में अगली सुनवाई 27 नवंबर को होगी।

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