कार की चोरी हो जाने पर बीमा का सहारा मिल जाना वाहन मालिक के लिए एक बहुत बड़ी राहत होती है. लेकिन अगर पुलिस में FIR दर्ज होने में देरी हो जाए, तो क्या बीमा कंपनी क्लेम देने से इनकार भी कर सकती है? दिल्ली के एक उपभोक्ता आयोग ने ऐसे ही मामले में अहम फैसला सुनाया है. आयोग ने नेशनल इंश्योरेंस कंपनी को एक कार मालिक को कुल 4.68 लाख रुपये देने का आदेश दिया है. यह मामला 26 दिसंबर 2019 का है, जब उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद स्थित प्रताप विहार से एक व्यक्ति की कार चोरी हो गई थी.


कार मालिक के मुताबिक, उसने घटना वाले दिन ही पुलिस स्टेशन जाकर शिकायत दी थी. हालांकि, पुलिस ने तीन दिन बाद, 29 दिसंबर को FIR दर्ज कराई. इसके बाद पुलिस वाहन का पता नहीं लगा सकी और जांच पूरी होने पर अदालत में अंतिम रिपोर्ट पेश कर दी गई. कार मालिक ने बीमा कंपनी से नुकसान की भरपाई मांगी, लेकिन कंपनी ने उसका दावा स्वीकार नहीं किया.


आयोग ने देरी को क्लेम खारिज करने का आधार नहीं माना


25 सितंबर को दिए गए फैसले में पूर्वी दिल्ली जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने बीमा कंपनी की दलील स्वीकार नहीं की. आयोग ने कहा कि कुछ दिनों की देरी के कारण किसी वास्तविक दावे को पूरी तरह खारिज करना उचित नहीं है. इस मामले में कंपनी का रवैया सेवा में कमी माना गयी.


आयोग ने बीमा कंपनी को कार के बीमित मूल्य के रूप में 4.31 लाख रुपये, मानसिक परेशानी के लिए 25 हजार रुपये और कानूनी खर्च के लिए 12,500 रुपये देने का निर्देश दिया. इस तरह कुल भुगतान 4.68 लाख रुपये होगा.


बीमा कंपनी ने क्यों खारिज किया क्लेम?


बीमा कंपनी का कहना था कि पॉलिसी की शर्तों के अनुसार चोरी की सूचना समय पर देना जरूरी था. कंपनी के मुताबिक, पुलिस में FIR दर्ज कराने और बीमा कंपनी को जानकारी देने में देरी हुई थी. चोरी की सूचना बीमा कंपनी को 2 जनवरी 2020 को दी गई थी.


इसी देरी को आधार बनाकर कंपनी ने क्लेम देने से इनकार कर दिया. इसके बाद कार मालिक ने उपभोक्ता आयोग का दरवाजा खटखटाया और मुआवजे की मांग की.


वाहन मालिकों के लिए क्या है सबक?


कार या बाइक चोरी होने पर पुलिस और बीमा कंपनी को जल्द से जल्द सूचना देना जरूरी है. शिकायत की कॉपी, FIR, बीमा पॉलिसी और अन्य दस्तावेज सुरक्षित रखें. अगर क्लेम खारिज होता है, तो उसके कारण लिखित में मांगें और जरूरत पड़ने पर उपभोक्ता आयोग में शिकायत करें. हालांकि, हर मामले का फैसला उसके तथ्यों और उपलब्ध सबूतों के आधार पर होता है.


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