बेंगलुरु: मैसूर दशहरे में जब भव्य जुलूस निकलता है और सोने से सजा स्वर्ण सिंहासन लोगों के आकर्षण का केंद्र बनता है, तब उसके साथ जुड़ा नाम 'गजराज अभिमन्यु' का भी होता है। विशाल कद-काठी, प्रशिक्षण और वर्षों के अनुभव के कारण यह गजराज मैसूर दशहरे की पहचान बन गया। 2020 से वह स्वर्ण सिंहासन उठाने वाले प्रमुख हाथी की भूमिका निभा रहा था।




लेकिन अभिमन्यु की पहचान केवल दशहरे की शाही परंपरा तक सीमित नहीं रही। जंगलों में मुश्किल अभियानों के दौरान भी उसने वन विभाग का साथ दिया। साल 1977 से कुमकी हाथी के रूप में काम करते हुए उसने जंगली हाथियों को पकड़ने और बाघों को काबू करने के अभियानों में हिस्सा लिया। उसके नाम 300 से अधिक हाथियों और 80 से ज्यादा बाघों को पकड़ने के अभियानों में भूमिका निभाने का रिकॉर्ड दर्ज है।




750 किलो का सिंहासन उठाने वाला गजराजमैसूर दशहरे का स्वर्ण सिंहासन करीब 750 किलोग्राम वजनी बताया जाता है। इस भारी सिंहासन को उठाकर जुलूस में चलना 'गर्वीले हाथी अभिमन्यु' की सबसे चर्चित जिम्मेदारियों में शामिल रहा। हर साल दशहरे के दौरान उसकी मौजूदगी लोगों के आकर्षण का केंद्र बनती थी।




इस जिम्मेदारी के पीछे वर्षों का प्रशिक्षण, अनुशासन और देखभाल रही। अभिमन्यु ने अपनी उम्र के लंबे हिस्से में वन विभाग के लिए काम किया और जंगलों में कठिन परिस्थितियों का सामना किया। अब 2026 में स्वर्ण सिंहासन उठाने और कुमकी अभियानों से उसकी सेवानिवृत्ति के साथ उसके कामकाजी जीवन का एक बड़ा अध्याय समाप्त हो गया है।




महावत के साथ सालों का रिश्ता, विदाई में भावनाएंहाथी और महावत का रिश्ता केवल काम तक सीमित नहीं होता। रोज की देखभाल, प्रशिक्षण और लंबे समय तक साथ रहने से दोनों के बीच गहरा तालमेल बनता है। गजराज अभिमन्यु ने भी अपने जीवन के कई दशक वन विभाग के कर्मचारियों और महावतों के साथ बिताए हैं।




ऐसे में उसकी विदाई उन लोगों के लिए भावुक पल है, जिन्होंने उसे वर्षों तक काम करते देखा और उसकी देखभाल की। जिस गजराज ने जंगलों में कठिन अभियानों से लेकर मैसूर दशहरे की भव्य परंपरा तक अपनी भूमिका निभाई, अब उससे जुड़ी जिम्मेदारियां दूसरे हाथियों को सौंपी जाएंगी।




अब मथिगोडु हाथी शिविर में रहेगा अभिमन्युअभिमन्यु कर्नाटक के मैसूर क्षेत्र स्थित मथिगोडु हाथी शिविर में रहता है। जुलाई 2026 में नियमित काम के दौरान लकड़ी का लट्ठा खिसकाते समय उसके बाएं दांत की नोक टूट गई थी। पशु चिकित्सकों ने जांच के बाद बताया था कि वह अन्यथा स्वस्थ है और दांत की नोक दोबारा बढ़ने की उम्मीद है। इसके कुछ समय बाद उसने सरगुरु क्षेत्र में बाघ को ट्रैक करने के अभियान में भी हिस्सा लिया था।




अभिमन्यु की सेवानिवृत्ति का अर्थ उसकी जीवन यात्रा का अंत नहीं, बल्कि लंबे समय तक जिम्मेदारियां निभाने के बाद एक नए दौर की शुरुआत है। मैसूर दशहरे की परंपरा और वन विभाग के अभियानों में उसकी भूमिका लंबे समय तक याद की जाएगी।

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