दिल्ली में बच्चों को प्राइवेट स्कूलों में पढ़ाना अभिभावकों के लिए हर गुजरते साल के साथ और भी ज्यादा मुश्किल होता जा रहा है. हाल ही में सामने आई रिपोर्ट्य और आंकड़ों ने एक चौंकाने वाला खुलासा किया है. रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले 20 साल में दिल्ली के प्राइवेट स्कूलों की फीस में बेतहाशा बढ़ोतरी दर्ज की गई है, जिसने आम आदमी की जेब को पूरी तरह से खाली कर दिया है. आइए जानते हैं कि इन 20 साल में फीस कितने प्रतिशत तक बढ़ गई है और इस पर सरकार का क्या रुख है. 


20 साल में आसमान पर पहुंची प्राइवेट स्कूलों की फीस 


अगर हम पिछले 20 साल के आंकड़ों पर नजर डालें, तो दिल्ली के प्राइवेट स्कूलों में औसतन 150 से 300 प्रतिशत तक की भारी बढ़ोतरी देखने को मिली है. कुछ बड़े और नामी स्कूलों में तो यह वृद्धि इससे भी कहीं ज्यादा है. साल 2005-2006 के आसपास जहां एक सामान्य प्राइवेट स्कूल की महीने की फीस 1,500 से 2,500 रुपये के बीच होती थी, वही आज बढ़कर 6,00 से 15,00 रुपये से अधिक हो चुकी है.


सिर्फ ट्यूशन फीस ही नहीं, बल्कि एडमिशन फीस, डेवलपमेंट चार्ज, एनुअल फीस और बस के किराए में भी कई गुना इजाफा हुआ है। एक सर्वे के मुताबिक, अकेले पिछले 10 सालों में ही दिल्ली के कई नामी स्कूलों की फीस में लगातार भारी बढ़ोतरी देखी गई थी, जो अब 20 साल के पैमाने पर और भी विकराल रूप ले चुकी है.


अभिभावकों की जेब पर चौतरफा मार


हर साल नया शैक्षणिक सत्र शुरू होते ही अभिभावकों की सबसे बड़ी चिंता फीस बढ़ोतरी को लेकर होती है. ऑनलाइन कम्युनिटी प्लेटफॉर्म LocalCircles और अन्य फोरम के सर्वे बताते हैं कि हर 10 में से 8 पेरेंट्स इस बात से परेशान हैं कि स्कूलों ने इस शैक्षणिक वर्ष में 10 फीसदी से ज्यादा फीस बढ़ा दी है. दिल्ली जैसे मेट्रो शहरों में कुछ स्कूलों में यह बढ़ोतरी 25 से 30 प्रतिशत तक दर्ज की गई है.


पेरेंट्स का कहना है कि उनकी सैलरी उस रफ्तार से नहीं बढ़ती, जिस रफ्तार से हर साल बच्चों की स्कूल फीस, किताबें, यूनिफॉर्म और वैन का खर्च बढ़ जाता है. स्थिति यह हो गई है कि एक बच्चे की पढ़ाई पर घर की आमदनी का एक बहुत बड़ा हिस्सा खर्च हो रहा है.


कोर्ट का फैसला और नियमों की उलझन


दिल्ली में प्राइवेट स्कूलों की फीस बढ़ाने का मामला काफी समय से कानूनी दांवपेच में फंसा हुआ है. हाल ही में दिल्ली हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि प्राइवेट स्कूलों को अपनी फीस निर्धारित करने का अधिकार है, बशर्ते यह पारदर्शी और नियमों के अनुसार हो.


कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि सरकार स्कूलों के प्रशासनिक अधिकारों में अनावश्यक हस्तक्षेप नहीं कर सकती, लेकिन साथ ही यह भी साफ किया कि किसी भी प्रकार की मनमानी या मुनाफाखोरी बर्दाश्त नहीं की जाएगी. इस आदेश के बाद दिल्ली के निजी स्कूलों और अभिभावकों के बीच फीस विवाद को लेकर चर्चा और तेज हो गई है.


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मनमानी रोकने के लिए सरकार का नया कानून


प्राइवेट स्कूलों की इस मनमानी फीस वृद्धि पर लगाम लगाने के लिए दिल्ली सरकार ने भी सख्त कदम उठाए हैं. सरकार ने दिल्ली स्कूल शिक्षा अधिनियम को अधिसूचित किया है. इस नए कानून के तहत दिल्ली के करीब 1,700 निजी स्कूलों को रेगुलेशन के दायरे में लाया गया है.


नए नियमों के मुताबिक, स्कूलों को अब स्कूल लेवल फीस रेगुलेशन कमेटी के सामने 18 कड़े मापदंडों और ऑडिटेड वित्तीय रिकॉर्ड्स के आधार पर फीस वृद्धि को जायज ठहराना होगा. इसमें पेरेंट्स की भागीदारी भी तय की गई है और बिना ठोस वजह या सिर्फ महंगाई का हवाला देकर कोई भी स्कूल अपनी मर्जी से फीस नहीं बढ़ा पाएगा. 


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