नई दिल्ली: चीन के लिए जापानी कंपनियों की दिलचस्पी लगातार कम होती जा रही है। कारोबारी माहौल में बढ़ती मुश्किलें, चीन की कंपनियों से बढ़ती प्रतिस्पर्धा, भू-राजनीतिक तनाव, बढ़ती लागत और कमजोर मांग ने जापान की कंपनियों को चीन में अपने कारोबार पर दोबारा विचार करने के लिए मजबूर कर दिया है। इसका फायदा भारत को मिल सकता है।
जापानी कंपनियां चीन से निकलकर अपना कारोबार अमेरिका, दक्षिण-पूर्व एशिया और भारत जैसे बाजारों में फैलाने की रणनीति पर काम कर रही हैं। खास बात यह है कि भारत जापानी कंपनियों के लिए सिर्फ मैन्युफैक्चरिंग का केंद्र नहीं, बल्कि बड़ा उपभोक्ता बाजार और निवेश का अवसर भी बन रहा है।
तेजी से घटी संख्याजापानी कॉरपोरेट रिसर्च फर्म Teikoku Databank के सर्वे के मुताबिक, जून 2026 में चीन में मौजूद जापानी कंपनियों की संख्या घटकर 10,118 रह गई। यह 2010 में शुरू हुए सर्वे के बाद सबसे कम संख्या है। दो साल में जापानी कंपनियों की संख्या करीब 22% घट चुकी है। वहीं 2012 के 14,394 कंपनियों के शिखर से तुलना करें तो यह गिरावट लगभग 30% है।
2024 से 2026 के बीच दो साल में करीब 4,137 चीन से बाहर निकल गईं या उनका कारोबार बंद हो गया, जबकि इस दौरान सिर्फ 1,221 नई कंपनियां चीन में आईं। चीन में अभी भी मौजूद जापानी कंपनियों में 40% से ज्यादा मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र से जुड़ी हैं। ऐसे में कंपनियों की यह रणनीति सप्लाई चेन के लिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
चीन में कारोबार करना क्यों मुश्किल?
- जापानी कंपनियों के लिए चीन में कारोबार की मुश्किलें कई स्तरों पर बढ़ी हैं।
- चीन के प्रॉपर्टी सेक्टर में गिरावट, रेयर-अर्थ एक्सपोर्ट पर प्रतिबंध, उत्पादन क्षमता का जरूरत से ज्यादा होना और सरकारी समर्थन वाली चीनी कंपनियों से बढ़ती प्रतिस्पर्धा इसके प्रमुख कारण हैं।
- इसके अलावा जापान और चीन के बीच बिगड़ते संबंधों ने कारोबारी जोखिम बढ़ा दिया है।
- जापानी कंपनियों को अब सिर्फ बिक्री और लागत की चिंता नहीं है, बल्कि कर्मचारियों, टेक्नोलॉजी और सप्लाई चेन की सुरक्षा को लेकर भी जोखिम दिखाई दे रहा है।
- हाल के महीनों में चीन ने जापानी कंपनियों की जांच बढ़ाई है और कुछ जापानी संस्थाओं को एक्सपोर्ट-कंट्रोल तथा निगरानी सूचियों में शामिल किया है।
- कुछ जापानी नागरिकों की गिरफ्तारी के मामलों ने भी कंपनियों की चिंता बढ़ाई है।
चीन की कंपनियां भी बन रहीं बड़ी चुनौतीजापानी कंपनियों के लिए चीन में समस्या सिर्फ राजनीतिक नहीं है। कारोबारी प्रतिस्पर्धा भी तेजी से बढ़ी है। ऑटोमोबाइल सेक्टर इसका बड़ा उदाहरण है।
एक समय चीन का तेजी से बढ़ता कार बाजार जापानी कंपनियों के लिए बड़ा अवसर था। अब चीनी इलेक्ट्रिक व्हीकल कंपनियां मजबूत घरेलू सप्लाई चेन और तेजी से विकसित हो रही टेक्नोलॉजी के साथ जापानी कंपनियों को कड़ी चुनौती दे रही हैं।
इस वजह से जापानी कंपनियां चीन से पूरी तरह बाहर निकलने के बजाय चुनिंदा कारोबार और फैक्ट्रियों पर फोकस कर रही हैं। यानी अब चीन जापान की कंपनियों के लिए किसी भी नए निवेश का डिफॉल्ट डेस्टिनेशन नहीं रह गया है।
अमेरिका भी जापानी कंपनियों को बुला रहाचीन से निकलने वाले को आकर्षित करने के लिए अमेरिका भी पूरी ताकत लगा रहा है। अमेरिका अपनी इंडस्ट्रियल पॉलिसी के तहत जापानी कंपनियों को देश में निवेश के लिए प्रोत्साहित कर रहा है।
2025 के अमेरिका-जापान टैरिफ समझौते के तहत जापान ने अमेरिका में प्रोजेक्ट्स के लिए 550 अरब डॉलर तक के लोन, निवेश और गारंटी की प्रतिबद्धता जताई थी। सेमीकंडक्टर, स्टील, क्रिटिकल मिनरल्स और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसे सेक्टर इसमें प्रमुख हैं। यानी चीन से निकलने वाला हर जापानी निवेश भारत को नहीं मिलेगा। अमेरिका और दक्षिण-पूर्व एशिया भी जापानी कंपनियों के लिए बड़े विकल्प हैं।
भारत क्यों बन रहा है पसंदीदा विकल्प?भारत की सबसे बड़ी ताकत उसका विशाल घरेलू बाजार है। वियतनाम और दक्षिण-पूर्व एशिया के कई दूसरे देशों के मुकाबले भारत में जापानी कंपनियों को एक साथ मैन्युफैक्चरिंग, घरेलू बिक्री और एक्सपोर्ट का अवसर मिलता है।
इसी वजह से जापानी बैंक और वित्तीय संस्थान भी भारत में अपनी मौजूदगी बढ़ा रहे हैं। जापानी क्षेत्रीय बैंकों ने चीन में अपनी शाखाओं की संख्या करीब 20% घटाई है, जबकि MUFG, SMBC और Mizuho जैसे जापान के बड़े बैंकों की चीन में लेंडिंग करीब 40% तक कम हुई है। दूसरी ओर, इन संस्थानों का भारत में निवेश तेजी से बढ़ रहा है।
जापानी बैंकों का भारत पर बड़ा दांवSMBC ने YES Bank में 20% हिस्सेदारी करीब 1.6 अरब डॉलर में खरीदी है। वहीं MUFG ने श्रीराम फाइनेंस में 20% हिस्सेदारी करीब 4.45 अरब डॉलर में खरीदी है और डीएमआई फाइनेंस में भी निवेश बढ़ाया है। Mizuho की सिक्योरिटीज यूनिट ने भारतीय इन्वेस्टमेंट बैंक Avendus में बहुमत हिस्सेदारी हासिल की है।
जापान का भारत में कितना निवेश?भारत में जापानी कंपनियों की मौजूदगी पहले से काफी मजबूत है। जापान का भारत में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश यानी एफडीआई 2.7 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा हो चुका है। देश में करीब 1,400 जापानी कंपनियां कारोबार कर रही हैं।
ऑटो सेक्टर में Toyota, Honda और Suzuki जैसी कंपनियां भारत में अपनी उत्पादन क्षमता बढ़ा रही हैं। Toyota और Suzuki ने मिलकर भारत में विस्तार के लिए करीब 11 अरब डॉलर के निवेश की प्रतिबद्धता जताई है।