तकरीबन 30 साल इंडस्ट्री में बिताने वाली दिव्या दत्ता अपने करियर में नैशनल अवॉर्ड की हकदार भी रहीं। अनगिनत भूमिकाएं जी चुकीं दिव्या पिछले दिनों 'चिड़िया' में अपने रोल के लिए खूब सराही गईं। इन दिनों मनोज बाजपेयी के साथ वे 'लास्ट मैन इन टावर' की सशक्त भूमिका से चर्चा में हैं। उनसे एक खास मुलाकात।
आज भी मां से बातें करती हूं के लिए उनकी मां बहुत बड़ी इंस्पिरेशन रही हैं। उनकी मां के गुजर जाने के बाद वे लंबे समय तक अवसाद में रहीं, मगर आज भी वे अपनी मां को अपने करीब महसूस करती हैं। वे कहती हैं, 'मुझे लगता है कि मां के साथ का रिश्ता हर किसी के लिए अनकंडीशनल होता है, जहां आपको कुछ जताने की, बताने की जरूरत महसूस नहीं होती। आज वो हमारे बीच नहीं हैं, मगर आज भी मैं उनसे बात करती हूं। वो एक जो स्ट्रेंथ है, वो बाहर से ड्राइव करती थीं, आज वो अंदर से आती है। सवाल हजार उठते हैं, कन्फ्यूजन होता है, कई बार लगता है ये रोल करूं या न करूं, कई बार कश्मकश के हालात पैदा होते हैं, मगर फिर मुझे जवाब मिल जाता है।
जिंदगी में धक्के लगने पर संभालते हैं कुछ लोगउन्होंने कहा, 'मैं समझती हूं कि जिनसे आप जने होते हैं अर्थात जिनसे आपका जन्म हुआ होता है, आप वो अवसान के बाद भी कहीं नहीं जाते। वो तो आपके आसपास ही रहते हैं। जब भी आप मुश्किल में होते हैं, कहीं न कहीं आपका हाथ थाम लेते हैं। जब जिंदगी में आपको कुछ धक्के लगते हैं, तब वो कार के सस्पेंशन टायर की तरह आपको संभाल लेते हैं।'
औरतें पहले खुद को संवारेंहाल ही में रिलीज हुई दिव्या की फिल्म लास्ट मैन इन टावर में दिव्या ने एक ऐसी महिला का किरदार निभाया है, जो जिंदगी से थक चुकी है और अब अपनी खुशियों के लिए किसी भी हद तक जा सकती है। एक औरत की निजता, उसका मी टाइम और उसके ख्वाब कितने जरूरी हैं? इस पर दिव्या दत्ता कहती हैं, 'हम महिलाओं की कंडीशनिंग ही ऐसी हुई है कि हम दूसरों के बारे में पहले सोचते हैं। हमारे मल्टीटास्किंग होने की जद्दोजहद में हम महिलाएं जीना भूल जाती हैं कि मेरे क्या ख्वाब हैं? मुझे क्या अच्छा लगता है? मुझे याद है, कोविड में हम बैडमिंटन खेला करते थे, तो एक दिन मैंने सोसायटी की एक आंटी से कहा कि वो भी बैडमिंटन खेलने आएं। वो बोलीं, 'मैं बचपन में खेला करती थी, अब कहां?' तो ये जो 'अब कहां?' है न ये महिलाओं की सबसे बड़ी रुकावट है। कई बार मुझे समझ नहीं आता, 'अब कहां?' यानी क्या?'
मुखौटे पहनकर ट्रोलिंग की जाती हैसोशल मीडिया को हैंडल करने के मुद्दे पर वे कहती हैं, 'हर चीज के फायदे-नुकसान दोनों होते हैं। आज दुनिया सिमट गई है। फायदा ये है कि आप अगर अपने काम के बारे में कुछ शेयर करना चाहते हैं, तो खबर तुरंत पूरी दुनिया में फैल जाती है। आपको तुरंत रिस्पॉन्स आज आता है। मैं इस मामले में बहुत खुशकिस्मत हूं कि मुझे ट्रोलिंग का सामना नहीं करना पड़ा, मगर जो लोग मुखौटे पहनकर सोशल मीडिया पर ट्रोल करते हैं, उन्हें इग्नोर करना बेहतर होता है। आप चाहे मिसोजनी की बात करें या आम ट्रोलिंग की, उस पर रिएक्ट करना है या उसे इग्नोर करना है, ये हमारे हाथ में होता है। हमारी शांति उसी में है कि हम अपना काम करते रहें और लगातार उसी पर फोकस करें। सोशल मीडिया पर एक पर्सेंट लोग आपको ट्रोल करना चाहते होंगे, बाकी के 99 फीसदी लोग आपको बहुत प्यार करते हैं, जो आपके ट्रोल्स से वही पर भिड़ जाते हैं। वहां पर अनगिनत लोग आपके लिए खड़े भी होते हैं, तो हमें अपना अच्छा काम करते रहना है।'
मनोज बाजपेयी के साथ काम करने का मौका'मैंने लास्ट मैन इन टावर से पहले भी मनोज बाजपेयी के साथ वीर जारा, स्पेशल छब्बीस, एलओसी कारगिल, ट्रैफिक आदि में काम किया था, मगर हमारे कभी भी कोई सीन साथ में नहीं रहे। लास्ट मैन इन टावर में मुझे पहली बार मनोज बाजपेयी जैसे जादू को महसूस करने का मौका मिला। उनके साथ काम करके बहुत मजा आया। बहुत जल्द हम एक और फिल्म में साथ दिखेंगे।'