शादी के बाद बहू और बेटा सिर्फ परिवार का हिस्सा नहीं रहते, बल्कि अपनी एक नई दुनिया भी बनाते हैं। ऐसे में उन्हें अपने फैसले लेने, समय बिताने और अपनी बातें आपस में रखने की जगह मिलनी चाहिए। ये दूरी नहीं बल्कि एक स्वस्थ रिश्ते की जरूरत होती है। घर के बड़े अपने अनुभव से सलाह देते हैं, जो कई बार काम भी आती है। लेकिन हर छोटे फैसले में दखल देना दोनों को असहज कर सकता है। कब घूमने जाना है, पैसे कैसे खर्च करने हैं या किस बात पर क्या फैसला लेना है, ऐसी बातें पहले पति-पत्नी के बीच तय होना बेहतर माना जाता है। परिवार का साथ, प्यार और अपनापन हमेशा जरूरी रहता है। वहीं बहू और बेटे की निजी जगह का सम्मान करना भी उतना ही जरूरी है। जब दोनों बातें साथ चलती हैं तो घर में भरोसा, खुलापन और अपनापन बना रहता है। रिश्तों में सबसे मजबूत नींव वही होती है जहां प्यार के साथ सीमाओं का भी सम्मान किया जाए। अगर कमरे में बिना दस्तक के जाना, फोन या निजी बातचीत में झांकना या हर बात की जानकारी लेना आदत बन जाए तो इससे भरोसा कमजोर हो सकता है। छोटी-छोटी बातें भी धीरे-धीरे मन में नाराजगी पैदा कर सकती हैं। इसलिए बातचीत और आपसी सम्मान सबसे आसान रास्ता माना जाता है। कई लोगों को लगता है कि अगर बहू और बेटा अपनी निजी बातें खुद तक रखें तो वो परिवार से दूर हो रहे हैं। जबकि ऐसा जरूरी नहीं है। प्राइवेसी का मतलब सिर्फ इतना है कि हर रिश्ते की अपनी एक सीमा होती है। सम्मान के साथ उस सीमा को समझना रिश्तों को और मजबूत बना सकता है।

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