क्रिकेट के भगवान कहे जाने वाले सचिन तेंदुलकर आज अपने पिता को याद कर भावुक हो गए. टीचर्स डे के मौके पर अपने पिता रमेश तेंदुलकर को अपना पहला मेंटोर और गाइड बताते हुए कहा कि वही थे जिन्होंने सबसे पहले मेरे क्रिकेट के प्रति प्यार को पहचाना. उन्होंने मुझे इस खेल में करियर बनाने की आजादी दी. सचिन ने बताया कि वह मौके पर उनके हेल्थकेयर पार्टनर, 'इंगा हेल्थ फ़ाउंडेशन' के साथ मिलकर 'प्रोफेसर रमेश तेंदुलकर मेमोरियल फेलोशिप' शुरू कर रहे हैं.
सचिन ने अपने एक्स पर अपने पिता के साथ फोटो शेयर करते हुए लिखा, "जब मैं उन लोगों के बारे में सोचता हूं जिन्होंने मेरे सफर को आकार दिया, तो मेरी शुरुआत क्रिकेट के मैदान या कोच से नहीं होती. मेरी शुरुआत घर से होती है. जब मुझे कोई नहीं जानता था, तब मेरे पिता ने क्रिकेट के लिए मेरे प्यार को पहचान लिया था और शायद इससे भी जरूरी कि वे समझ गए थे कि यह मेरे लिए क्या मायने रखता है. वह नहीं जानते थे कि क्रिकेट में मैं कितना बड़ा हो पाऊंगा, लेकिन उन्होंने मुझे इसे आगे बढ़ाने की आज़ादी दी."
उन्होंने आगे लिखा, "मेरे पिता, रमेश तेंदुलकर, एक लेखक, कवि और प्रोफेसर थे, लेकिन उससे भी बढ़कर वे मेरे साथ कई और लोगों के लिए भी एक मेंटर और गाइड थे. उन्होंने मुझे क्रिकेट खेलने की आजादी दी, साथ ही यह भी याद दिलाया कि सफलता कभी भी चरित्र की कीमत पर नहीं मिलनी चाहिए. बचपन में मेरे पिता की कही कुछ बातें मेरे साथ जीवन भर रहीं. उन्होंने बताया कि हारना ठीक है, लेकिन धोखा देना नहीं. कभी शॉर्टकट न अपनाएं. मैं बस एक ऐसा लड़का था जिसे क्रिकेट खेलना पसंद था. मेरे पिता ने उसमें कुछ और भी देखा. उन्होंने यह तय करने की कोशिश नहीं की कि मुझे क्या बनना चाहिए. इसके बजाय, उन्होंने मुझे खुद यह पता लगाने के लिए जगह और सहयोग दिया. कई मायनों में, एक महान शिक्षक या मेंटर यही करता है. वे आपमें उस संभावना को पहचान लेते हैं जिसे आप खुद नहीं पहचान पाते."
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सचिन तेंदुलकर ने आगे लिखा, "भारत में युवा टैलेंट की कोई कमी नहीं है. चाहे कोई बच्चा बल्ला उठाए, गेंद उठाए, किताब उठाए या किसी दूसरे क्षेत्र में अपनी क्षमता को पहचाने, यह उन्हें अपने तरीके से खास बनाता है. उनमें अक्सर टैलेंट की कमी नहीं होती, बल्कि ऐसे लोगों तक पहुंच की कमी होती है जो उस टैलेंट को पहचान सकें और उसे निखारने में मदद कर सकें. यही सोच उस फाउंडेशन को शुरू करने के पीछे मुख्य वजह थी जिसे अंजलि और मैंने शुरू किया था. पूरे भारत में ऐसे बच्चे हैं जिनमें बहुत क्षमता है, लेकिन हो सकता है कि उन्हें कभी अपनी क्षमता को पहचानने का मौका न मिले क्योंकि उनके पास कोच, मेंटर, सीखने के सही माहौल या बुनियादी स्वास्थ्य सेवा तक पहुंच नहीं होती. हमारा विजन यह है कि उन्हें खेल, स्वास्थ्य सेवा और शिक्षा तक समान पहुंच मिले, और यह साबित करने का मौका मिले कि वे भी आगे बढ़ सकते हैं."
When I think about the people who shaped my journey, I do not begin with a cricket ground or a coach. I begin at home.
Long before anyone outside my family knew my name, my father had begun to recognise my love for cricket and, perhaps more importantly, understand what it meant… pic.twitter.com/AfBH6QOolX
— Sachin Tendulkar (@sachin_rt) September 5, 2026
सचिन ने आगे लिखा, "मेरे पिता ने अपना जीवन एक शिक्षक के तौर पर बिताया, और मुझे लगता है कि उन्होंने मुझे जो सबसे बड़ी सीख दी, वह थी किसी को अपनी क्षमता को पहचानने का आत्मविश्वास और मौका देने का महत्व. इस टीचर्स डे पर, हम उस पहले व्यक्ति का सम्मान करने का मौका ले रहे हैं जिन्होंने मुझमें कुछ देखा और मुझ पर भरोसा किया कि मैं क्या बन सकता हूं. हमें बहुत गर्व है कि हम अपने लंबे समय से चले आ रहे हेल्थकेयर पार्टनर, 'इंगा हेल्थ फ़ाउंडेशन' के साथ मिलकर 'प्रोफ़ेसर रमेश तेंदुलकर मेमोरियल फ़ेलोशिप' शुरू कर रहे हैं."
उन्होंने आगे लिखा, "हर साल, एक MD (डॉक्टर ऑफ मेडिसिन) को श्रीनगर में क्लेफ़्ट और क्रेनियोफ़ेशियल केयर में स्पेशलाइजेशन करने के एक साल के मौके के लिए आर्थिक मदद मिलेगी. प्रोग्राम पूरा होने पर, फेलो को सचिन तेंदुलकर फाउंडेशन से उनकी बेहतरीन परफ़ॉर्मेंस के लिए एक सर्फिटिकेट मिलेगा. यह क्रिटिकल केयर में हेल्थकेयर प्रोफेशनल्स की मदद करने और युवा डॉक्टरों को उनके स्टडी के क्षेत्र में प्रोत्साहित करने के हमारे लंबे समय से चले आ रहे कमिटमेंट का हिस्सा है. मेरे लिए, यह सिर्फ एक फेलोशिप से कहीं बढ़कर है. यह उस चीज को आगे बढ़ाने का एक तरीका है जिसमें मेरे पिता का गहरा विश्वास था कि शिक्षा से मौके बनते हैं, और वे मौके तब सच में सार्थक होते हैं जब उनका इस्तेमाल दूसरों की सेवा के लिए किया जाता है."
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अपने पोस्ट के अंत में सचिन तेंदुलकर ने लिखा, "मेरे पिता ने मुझे अपना रास्ता खुद ढूंढने का आत्मविश्वास दिया. उन्होंने अपना जीवन दूसरों को शिक्षित करने और गाइड करने में लगा दिया, और मुझे उम्मीद है कि हम दूसरों के लिए भी संभावनाओं का वैसा ही माहौल बना पाएंगे, जिससे बच्चों और युवाओं को यह पता लगाने का मौका मिले कि वे क्या बन सकते हैं, और उसे हासिल करने के साधन भी मिलें. एक टीचर की सीख भले ही एक स्टूडेंट से शुरू हो, लेकिन उसका असर बहुत दूर तक जा सकता है, एक ज़िंदगी से दूसरी जिंदगी तक और एक पीढ़ी से अगली पीढ़ी तक."
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