Gariaband News: छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले में स्थित देवभोग जगन्नाथ मंदिर आस्था, इतिहास और परंपरा का अद्भुत संगम है. इस मंदिर का सीधा संबंध ओडिशा के विश्व प्रसिद्ध पुरी जगन्नाथ मंदिर से माना जाता है. यहां की सबसे अनोखी परंपरा यह है कि भगवान जगन्नाथ आज भी अपने भक्तों और किसानों से ‘लगान’ लेते हैं. करीब 120 वर्षों से चली आ रही इस परंपरा के तहत क्षेत्र के किसान अपनी फसल का एक हिस्सा भगवान को अर्पित करते हैं, जिसे बाद में पुरी जगन्नाथ मंदिर भेजा जाता है.

84 गांवों का संकल्प, आज भी निभाई जा रही परंपरा

स्थानीय मान्यता के अनुसार, करीब 120 साल पहले देवभोग क्षेत्र के 84 गांवों के प्रमुखों (गोहटिया) ने सामूहिक संकल्प लिया था कि हर वर्ष अपनी उपज का एक हिस्सा भगवान जगन्नाथ को लगान के रूप में अर्पित करेंगे. तब से आज तक किसान मुख्य रूप से सुगंधित चावल और मूंग दाल भगवान को समर्पित करते आ रहे हैं. श्रद्धालु इसे भगवान के प्रति अपनी आस्था और समर्पण का प्रतीक मानते हैं.


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पुरी जगन्नाथ मंदिर से है सीधा संबंध

रथयात्रा से कुछ दिन पहले हर वर्ष पुरी जगन्नाथ मंदिर से एक विशेष प्रतिनिधि (पंडा) देवभोग पहुंचता है. यहां एकत्र किए गए लगान का लगभग एक-चौथाई हिस्सा वह अपने साथ पुरी ले जाता है. मान्यता है कि पुरी मंदिर में भगवान जगन्नाथ को सबसे पहले देवभोग से भेजे गए सुगंधित चावल का ही भोग लगाया जाता है. यही परंपरा दोनों मंदिरों के बीच आध्यात्मिक संबंध को और मजबूत बनाती है.

‘कुसुम भोग’ से कैसे बना ‘देवभोग’

ब्रिटिश काल में इस पूरे क्षेत्र का नाम ‘कुसुम भोग’ हुआ करता था. जब यहां के विशेष चावल और अन्य अनाज भगवान जगन्नाथ के भोग के लिए नियमित रूप से पुरी भेजे जाने लगे, तब इस धार्मिक परंपरा के सम्मान में करीब 123 वर्ष पहले इस क्षेत्र का नाम बदलकर ‘देवभोग’ रख दिया गया.

बिना सीमेंट और लोहे के बना भव्य मंदिर

देवभोग जगन्नाथ मंदिर की वास्तुकला भी लोगों को आकर्षित करती है. मंदिर के निर्माण में न तो सीमेंट का उपयोग किया गया और न ही लोहे की छड़ों का. पत्थरों को जोड़ने के लिए बेल, चिवड़ा, बबूल की गोंद और अन्य पारंपरिक देसी सामग्रियों का इस्तेमाल किया गया. इस अनूठी निर्माण शैली के कारण मंदिर को तैयार होने में करीब 47 वर्ष लगे और वर्ष 1901 में इसका निर्माण पूरा हुआ.

3 पीढ़ियों ने पूरा किया मंदिर निर्माण

मंदिर निर्माण की शुरुआत तत्कालीन जमींदार भगवानो बेहेरा ने अपनी भूमि दान देकर कराई थी. निर्माण के दौरान उनके निधन के बाद रामचंद्र बेहेरा ने कार्य संभाला, लेकिन उनका भी असमय निधन हो गया. अंततः बलभद्र बेहेरा ने वर्ष 1901 में मंदिर का निर्माण पूरा कराया.


स्थानीय लोग इसे भगवान जगन्नाथ की विशेष कृपा और दैवीय संयोग मानते हैं. आज यह मंदिर न केवल आस्था का प्रमुख केंद्र है, बल्कि अपनी अनूठी परंपराओं और ऐतिहासिक विरासत के कारण देशभर के श्रद्धालुओं और पर्यटकों को भी आकर्षित करता है.

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