नई दिल्ली: नए वित्तीय वर्ष के आगाज के साथ ही देशभर में 1 अप्रैल 2026 से ‘नया लेबर कोड’ पूरी तरह लागू हो चुका है। इस कानून ने न केवल बड़ी कंपनियों के सैलरी स्ट्रक्चर को बदलकर रख दिया है, बल्कि करोड़ों नौकरीपेशा लोगों की मासिक बजट का गणित भी बिगाड़ दिया है। सबसे ज्यादा असर ₹50,000 मासिक CTC वाले मिडिल क्लास कर्मचारियों पर पड़ा है, जिनकी घर ले जाने वाली सैलरी (Take-home salary) में अच्छी-खासी कटौती देखी जा रही है। ‘कोड ऑन वेजेस 2019’ के नए नियमों के कारण अब कर्मचारियों के हाथ में हर महीने करीब ₹600 तक कम पैसे आ रहे हैं।
इस बड़े बदलाव की मुख्य वजह ‘वेजेस’ (मजदूरी) की नई परिभाषा है। नए लेबर कोड के तहत अब कंपनियों के लिए यह अनिवार्य हो गया है कि वे कर्मचारी की बेसिक सैलरी को कुल CTC (Cost to Company) का कम से कम 50% रखें। पहले कंपनियां चालाकी करती थीं और बेसिक सैलरी को केवल 30-40% रखकर बाकी पैसा HRA, स्पेशल अलाउंस या बोनस के नाम पर बांट देती थीं। इससे पीएफ (PF) की कटौती कम होती थी और कर्मचारी को हाथ में ज्यादा पैसा मिलता था। लेकिन अब बेसिक सैलरी बढ़ते ही पीएफ, ईएसआईसी (ESIC) और ग्रेच्युटी के लिए कटने वाला पैसा बढ़ गया है, जिससे आपकी ‘इन-हैंड’ सैलरी कम हो गई है।
अगर आपकी सालाना CTC ₹6 लाख (यानी ₹50,000 महीना) है, तो समझिए कि आपकी जेब पर क्या असर पड़ा है। पुराने स्ट्रक्चर में अगर आपकी बेसिक ₹20,000 थी, तो 12% के हिसाब से आपका पीएफ ₹2,400 कटता था और हाथ में करीब ₹45,000 आते थे। नए नियमों के बाद कंपनी को आपकी बेसिक सैलरी बढ़ाकर ₹25,000 करनी पड़ी। अब बेसिक बढ़ने से आपका पीएफ योगदान ₹2,400 से बढ़कर ₹3,000 हो गया है। नतीजा यह हुआ कि आपकी इन-हैंड सैलरी घटकर ₹44,400 रह गई। यानी हर महीने ₹600 का सीधा झटका!
भले ही आपको हर महीने मिलने वाला पैसा कम लग रहा हो, लेकिन लंबी अवधि में यह आपके लिए मुनाफे का सौदा है। बेसिक सैलरी बढ़ने का सीधा असर आपकी ग्रेच्युटी और रिटायरमेंट फंड पर पड़ेगा। अब आपकी ग्रेच्युटी की राशि पहले के मुकाबले काफी ज्यादा बनेगी। 5 साल की सर्विस पर मिलने वाली ग्रेच्युटी अब ₹72,115 तक पहुंच सकती है। इसके अलावा, चूंकि आपका और आपकी कंपनी का पीएफ योगदान बढ़ गया है, इसलिए रिटायरमेंट के समय आपके पास पहले की तुलना में 20-25% अधिक फंड जमा होगा।
शॉर्ट टर्म में देखें तो ₹15,000 से ₹50,000 के बीच कमाने वाले कर्मचारियों के लिए यह दौर मुश्किल भरा है, क्योंकि महंगाई के समय में हाथ में कम पैसा आना बचत को प्रभावित करता है। हालांकि, टैक्स एक्सपर्ट्स का मानना है कि एचआरए (HRA) क्लेम और एनपीएस (NPS) जैसे निवेशों के जरिए टैक्स प्लानिंग करके कुछ राहत पाई जा सकती है। सरकार का मकसद इन चार नए कोड्स (वेजेस, सोशल सिक्योरिटी, इंडस्ट्रियल रिलेशंस और ओएसएच) के जरिए श्रमिकों को सामाजिक सुरक्षा देना है। 1 अप्रैल से आपकी सैलरी स्लिप बदल चुकी है, इसलिए बेहतर होगा कि आप अपने एचआर (HR) से बात करें और अपना नया सैलरी ब्रेकअप जरूर चेक करें।
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