ऋषिकेश। पूर्ण चंद्र ग्रहण के पावन अवसर पर परमार्थ निकेतन में एक दिव्य एवं आध्यात्मिक ध्यान साधना कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में विश्व के विभिन्न देशों से आए साधक, पर्यटक और योग जिज्ञासु शामिल हुए। यह विशेष ध्यान सत्र पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती एवं साध्वी भगवती सरस्वती के पावन सान्निध्य में संपन्न हुआ।


पूर्णिमा और ग्रहण को भारतीय सनातन परंपरा में साधना और आत्मचिंतन का विशेष काल माना जाता है। इसी आध्यात्मिक महत्व को ध्यान में रखते हुए आयोजित इस कार्यक्रम में वैदिक मंत्रोच्चार और शांत वातावरण के बीच साधकों ने सामूहिक रूप से ‘थर्ड आई मेडिटेशन’ का अभ्यास किया।


स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने कहा कि जीवन का वास्तविक जागरण भीतर की आंख खोलने में है। बाहरी संसार को देखने के लिए दो नेत्र पर्याप्त हैं, किंतु सत्य के दर्शन के लिए तीसरे नेत्र की आवश्यकता होती है। उन्होंने उत्तराखंड को शिव की त्रिनेत्र और त्रिशूल की प्रतीक भूमि बताते हुए कहा कि जब तीसरा नेत्र खुलता है तो तनाव, भय और अज्ञान जैसे जीवन के तीन शूल समाप्त हो जाते हैं।


साध्वी भगवती सरस्वती जी ने ध्यान की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि जीवन की अधिकतर समस्याएँ मन से उत्पन्न होती हैं। यदि मन शांत हो तो जीवन सुखमय हो जाता है। उन्होंने होली पर्व के संदर्भ में संदेश दिया कि बाहरी रंगों के साथ-साथ मन के नकारात्मक भाव—ईर्ष्या, क्रोध और द्वेष—को भी त्यागकर प्रेम, करुणा और सेवा के रंगों से जीवन को सजाना चाहिए।कार्यक्रम के दौरान साधकों ने मौन साधना, प्राणायाम और गहन ध्यान का अभ्यास कर आध्यात्मिक शांति का अनुभव किया।

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